जलवायु परिवर्तन और आपदा से निपटने में AI बनेगा मददगार, श्रीदेव सुमन विश्वविद्यालय में अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन का शुभारंभ

by intelliberindia
  • विशेषज्ञों ने हिमालयी क्षेत्र में अवैज्ञानिक विकास को बताया आपदाओं का बड़ा कारण, सतत पर्यटन के लिए डिजिटल तकनीक और स्थानीय समुदायों की भागीदारी पर दिया जोर
टिहरी। जलवायु परिवर्तन की बढ़ती चुनौतियों, प्राकृतिक आपदाओं के खतरे और हिमालयी क्षेत्र में पर्यटन को सुरक्षित एवं टिकाऊ बनाने के उद्देश्य से श्रीदेव सुमन उत्तराखंड विश्वविद्यालय में दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन का शुभारंभ हुआ। तीन नवंबर को विश्वविद्यालय के आंतरिक गुणवत्ता आश्वासन प्रकोष्ठ (आईक्यूएसी), जिला आपदा प्रबंधन प्राधिकरण टिहरी गढ़वाल, पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय भारत सरकार और उत्तराखंड राज्य विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद (यूकॉस्ट) के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित सम्मेलन का विषय ‘जलवायु परिवर्तन और आपदा रोधी पर्यटन के लिए डिजिटल एजेंडा एवं कृत्रिम बुद्धिमत्ता’ (CEDRT-2026) रखा गया है। सम्मेलन में देश-विदेश के विशेषज्ञों, शिक्षाविदों और शोधार्थियों ने हिमालयी क्षेत्र की चुनौतियों, आपदा प्रबंधन में आधुनिक तकनीक की भूमिका और पर्यावरण अनुकूल पर्यटन की संभावनाओं पर विचार साझा किए।

हिमालयी क्षेत्र में जलवायु परिवर्तन बड़ी चुनौती : कुलपति प्रो. महाजन

उद्घाटन सत्र के मुख्य अतिथि कैबिनेट मंत्री डॉ. धन सिंह रावत अपरिहार्य कारणों से कार्यक्रम में शामिल नहीं हो सके। उन्होंने अपना शुभकामना संदेश प्रेषित किया। विशिष्ट अतिथि उत्तराखंड मुक्त विश्वविद्यालय हल्द्वानी के कुलपति प्रो. नवीन चंद्र लोहानी, श्रीदेव सुमन उत्तराखंड विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. अम्बरीश कुमार महाजन, मुख्य वक्ता प्रो. हरीश चंद्र नैनवाल, परिसर निदेशक प्रो. एम.एस. रावत, आईक्यूएसी निदेशक प्रो. गुलशन कुमार ढींगरा और कुलसचिव दिनेश चंद्र ने संयुक्त रूप से सम्मेलन का उद्घाटन किया।

सम्मेलन की अध्यक्षता करते हुए कुलपति प्रो. अम्बरीश कुमार महाजन ने विभिन्न विश्वविद्यालयों, महाविद्यालयों और शोध संस्थानों से पहुंचे विशेषज्ञों, शोधार्थियों एवं विद्यार्थियों का स्वागत किया। उन्होंने कहा कि जलवायु परिवर्तन पूरी दुनिया के सामने गंभीर चुनौती बन चुका है। वैश्विक तापमान में वृद्धि, अनियमित वर्षा चक्र, हिमनदों का पिघलना, बाढ़, भूस्खलन, सूखा और चरम मौसमी घटनाएं प्राकृतिक एवं आर्थिक संसाधनों को प्रभावित कर रही हैं। हिमालयी क्षेत्र जलवायु परिवर्तन के प्रति बेहद संवेदनशील है। उत्तराखंड जैसे पर्वतीय राज्य में पर्यटन केवल आर्थिक गतिविधि नहीं, बल्कि लाखों लोगों की आजीविका, स्थानीय संस्कृति और सामाजिक संरचना का महत्वपूर्ण आधार है।

पर्यटन में पर्यावरण, सुरक्षा और वहन क्षमता को मिले प्राथमिकता

विशिष्ट अतिथि प्रो. नवीन चंद्र लोहानी ने कहा कि भविष्य का पर्यटन केवल पर्यटकों की संख्या बढ़ाने तक सीमित नहीं होना चाहिए। पर्यटन स्थलों की पर्यावरणीय स्थिति, वहन क्षमता, सुरक्षा और दीर्घकालिक स्थिरता को भी प्राथमिकता देनी होगी। डिजिटल क्रांति के इस दौर में कृत्रिम बुद्धिमत्ता और सैटेलाइट तकनीक ने आपदा प्रबंधन एवं पर्यटन नियोजन की संभावनाओं को व्यापक बनाया है।

अवैज्ञानिक विकास गतिविधियां आपदाओं को दे रहीं न्योता

तकनीकी सत्र में गढ़वाल विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफेसर प्रो. एमपीएस बिष्ट ने ‘विकास की आपाधापी में मानव की अनभिज्ञता आपदा को न्योता’ विषय पर व्याख्यान दिया। उन्होंने कहा कि हिमालयी क्षेत्र में अवैज्ञानिक विकास गतिविधियां प्राकृतिक आपदाओं का खतरा बढ़ाती हैं। केदारनाथ, चमोली के तपोवन और थराली की आपदाएं इस क्षेत्र की संवेदनशीलता को समझने की जरूरत बताती हैं। प्रकृति की शक्ति और भूगर्भीय परिस्थितियों की अनदेखी विकास के लिए गंभीर चुनौती बन सकती है।

वहीं, वाडिया इंस्टीट्यूट के पूर्व वैज्ञानिक प्रो. डीपी डोभाल ने हिमालयी ग्लेशियरों की गतिशीलता और उनसे जुड़ी आपदाओं पर प्रकाश डाला। उन्होंने ग्लेशियर झीलों के फटने से आने वाली बाढ़, हिमस्खलन और अन्य हिमालयी खतरों के बारे में विस्तार से जानकारी दी।

AI से स्मार्ट बनेगा पर्यटन, लेकिन मानवीय संवेदनाएं रहेंगी अहम

जापान के एशिया पेसिफिक विश्वविद्यालय के प्रोफेसर शुन्साकू हाशिमोटो ने ‘एआई के साथ पर्यटन का पुनर्रूपण : मानव-केंद्रित हॉस्पिटैलिटी के मायने’ विषय पर व्याख्यान दिया। उन्होंने कहा कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता पर्यटन को अधिक स्मार्ट और सुविधाजनक बना रही है, लेकिन हॉस्पिटैलिटी की असली पहचान मानवीय संवेदनाओं, व्यक्तिगत जुड़ाव और अतिथि सत्कार में है। तकनीक सुविधाएं बेहतर कर सकती है, लेकिन यादगार अनुभव मानवीय अपनत्व से ही बनते हैं।

महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय रोहतक के निदेशक प्रो. सुरेंद्र सिंह यादव ने जलवायु संबंधी चरम घटनाओं और ग्रामीण महिलाओं की बढ़ती संवेदनशीलता पर विचार रखे। उन्होंने कहा कि जलवायु परिवर्तन ग्रामीण महिलाओं के जीवन, आजीविका और सामाजिक-आर्थिक स्थिति को प्रभावित करता है। ऐसे में उनके सशक्तीकरण और जलवायु परिवर्तन के अनुरूप ढलने की क्षमता बढ़ाना आवश्यक है।

पर्यटन स्थलों की क्षमता के अनुरूप हो पर्यटकों की आवाजाही

गढ़वाल विश्वविद्यालय के प्रो. हरीश चंद्र नैनवाल ने कहा कि जलवायु परिवर्तन अब केवल पर्यावरण तक सीमित समस्या नहीं है, बल्कि अर्थव्यवस्था, सामाजिक व्यवस्था और पर्यटन उद्योग के सामने भी बड़ी चुनौती है। उत्तराखंड में बाढ़, भूस्खलन और अनियमित वर्षा जैसी घटनाएं पर्यटन गतिविधियों को प्रभावित करती हैं। ऐसे में डिजिटल तकनीक और कृत्रिम बुद्धिमत्ता का उपयोग करते हुए प्रकृति के साथ सामंजस्य बनाकर पर्यटन का विकास करना होगा। इसमें स्थानीय समुदायों की भागीदारी और पर्यावरण संरक्षण महत्वपूर्ण हैं।

गढ़वाल विश्वविद्यालय के प्रो. आरके डोडी ने पर्यटन स्थलों की वहन क्षमता (कैरीइंग कैपेसिटी) के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि पर्यटन का विकास पर्यावरण और स्थानीय संसाधनों की सीमाओं को ध्यान में रखकर होना चाहिए। पर्यटकों की संख्या और उपलब्ध संसाधनों के बीच संतुलन बनाए रखना सतत एवं जिम्मेदार पर्यटन के लिए जरूरी है।

चारधाम यात्रा के लिए आपदा प्रबंधन तैयारियों की दी जानकारी

अपर जिलाधिकारी टिहरी शैलेंद्र सिंह नेगी ने चारधाम यात्रा के दृष्टिगत जिला आपदा प्रबंधन प्राधिकरण टिहरी गढ़वाल की तैयारियों और व्यवस्थाओं की जानकारी दी। वहीं, डीएनए लैब देहरादून के वैज्ञानिक डॉ. नरोत्तम शर्मा ने ‘शिक्षण, प्रशिक्षण एवं पर्यटन (टी-3) : हिमालयी विज्ञान, शिक्षा एवं सामुदायिक जनसंपर्क पहल’ विषय पर व्याख्यान देते हुए विज्ञान आधारित शिक्षा, प्रशिक्षण और पर्यटन के माध्यम से स्थानीय समुदायों की भागीदारी बढ़ाने की आवश्यकता बताई।

SDRF ने प्रतिभागियों को सिखाए आपदा से बचाव के गुर

सम्मेलन के अंत में जिला आपदा प्रबंधन विभाग टिहरी के तत्वावधान में एसडीआरएफ की टीम ने प्रतिभागियों को आपदा प्रबंधन का व्यावहारिक प्रशिक्षण दिया। विशेषज्ञों ने भूकंप, भूस्खलन, बाढ़ और अन्य प्राकृतिक आपदाओं के दौरान बरती जाने वाली सावधानियों, बचाव एवं राहत कार्यों की जानकारी दी। साथ ही प्राथमिक उपचार, रेस्क्यू तकनीक, आपातकालीन परिस्थितियों में स्वयं को सुरक्षित रखने और धैर्यपूर्वक कार्य करने के तरीके भी बताए।

आपदा जागरूकता और सतत पर्यटन पर मंथन

सम्मेलन के संयोजक एवं आईक्यूएसी निदेशक प्रो. गुलशन कुमार ढींगरा ने आयोजन के उद्देश्यों पर प्रकाश डालते हुए कहा कि ऐसे सम्मेलनों से आपदा प्रबंधन के प्रति जागरूकता बढ़ाने, प्रभावी रणनीतियों पर विचार-विमर्श करने और प्रतिभागियों को व्यावहारिक ज्ञान उपलब्ध कराने में मदद मिलती है।

परिसर निदेशक प्रो. एमएस रावत ने अतिथियों, वक्ताओं और प्रतिभागियों का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि आपदा प्रबंधन के प्रति जागरूकता, तत्परता और सामूहिक सहभागिता वर्तमान समय की आवश्यकता है।

कार्यक्रम का संचालन डॉ. प्रीति खंडूरी और डॉ. हेमंत बिष्ट ने किया। आयोजन में डॉ. सीमा बेनीवाल, डॉ. गौरव वाष्णेय, डॉ. राकेश जोशी और डॉ. संजय महर का विशेष सहयोग रहा। इस अवसर पर डीन विज्ञान प्रो. एसपी सती, डीन कला प्रो. पीके सिंह, डीन वाणिज्य प्रो. विजय श्रीवास्तव, चीफ प्रॉक्टर प्रो. धर्मेंद्र तिवारी, डीन छात्र कल्याण प्रो. हेमलता मिश्रा, प्रो. वीडी पाण्डेय, प्रो. संगीता मिश्रा, प्रो. अधीर कुमार, प्रो. पुष्पाजलि आर्य, प्रो. दीपा शर्मा, प्रो. सुरमान, प्रो. वीके गुप्ता, प्रो. सीएस नेगी, डॉ. शालिनी रावत सहित विश्वविद्यालय के अनेक प्राध्यापक, शोधार्थी, विद्यार्थी और शिक्षणेत्तर कर्मचारी उपस्थित रहे।

उद्घाटन सत्र में विश्वविद्यालय के संगीत विभाग के विद्यार्थियों ने सरस्वती वंदना और स्वागत गीत प्रस्तुत किया। सम्मेलन में विभिन्न विश्वविद्यालयों एवं शोध संस्थानों से आए विशेषज्ञों और प्रतिभागियों ने जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों से निपटने तथा डिजिटल तकनीक एवं कृत्रिम बुद्धिमत्ता के माध्यम से हिमालयी क्षेत्र में सुरक्षित और सतत पर्यटन को बढ़ावा देने पर विचार साझा किए।

 

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