उत्तराखंड में सुरक्षित और सतत पर्यटन के लिए आपदा प्रबंधन की प्रभावी तैयारी जरूरी – डॉ. धन सिंह रावत

by intelliberindia
  • जलवायु परिवर्तन और आपदा रोधी पर्यटन पर अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन का समापन
  • 80 शोधार्थियों ने प्रस्तुत किए शोधपत्र, एआर-वीआर तकनीक से लेकर ग्लेशियल झीलों की निगरानी तक विभिन्न विषयों पर हुआ मंथन

टिहरी । श्रीदेव सुमन उत्तराखण्ड विश्वविद्यालय में जलवायु परिवर्तन, पर्यावरण संरक्षण और आपदा रोधी पर्यटन की चुनौतियों पर आयोजित दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन का समापन हो गया। समापन सत्र में कैबिनेट मंत्री डॉ. धन सिंह रावत ने उत्तराखंड की धार्मिक एवं प्राकृतिक पर्यटन संभावनाओं के साथ हिमालयी क्षेत्रों में बढ़ती आपदा संबंधी चुनौतियों पर चर्चा करते हुए सुरक्षित, सतत और जिम्मेदार पर्यटन को बढ़ावा देने की आवश्यकता बताई। सम्मेलन में देश के विभिन्न संस्थानों से आए विशेषज्ञों और शोधकर्ताओं ने कृत्रिम बुद्धिमत्ता, डिजिटल तकनीक, जलवायु परिवर्तन तथा पर्यावरण संरक्षण के विभिन्न पहलुओं पर विचार साझा किए। तकनीकी सत्रों में लगभग 80 शोधार्थियों ने अपने शोधपत्र प्रस्तुत किए।

श्रीदेव सुमन उत्तराखण्ड विश्वविद्यालय के IQAC, जिला आपदा प्रबंधन प्राधिकरण टिहरी गढ़वाल, पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय भारत सरकार एवं यूकॉस्ट के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित सम्मेलन का विषय ‘जलवायु परिवर्तन और आपदा रोधी पर्यटन के लिए डिजिटल एजेंडा एवं कृत्रिम बुद्धिमत्ता’ (CEDRT-2026) रहा।

सतत पर्यटन और आपदा प्रबंधन को मिलेगी नई दिशा

समापन समारोह के मुख्य अतिथि कैबिनेट मंत्री डॉ. धन सिंह रावत ने कहा कि उत्तराखंड में धार्मिक, सांस्कृतिक और प्राकृतिक पर्यटन की व्यापक संभावनाएं हैं। इन संभावनाओं का लाभ उठाने के लिए पर्यटन विकास के साथ पर्यावरण संरक्षण और आपदा प्रबंधन को भी प्राथमिकता देनी होगी। उन्होंने कहा कि पर्वतीय क्षेत्रों की संवेदनशील भौगोलिक परिस्थितियों को देखते हुए आपदाओं से निपटने की पूर्व तैयारी, सुरक्षित पर्यटन व्यवस्था और जिम्मेदार पर्यटन को प्रोत्साहित करना जरूरी है। उन्होंने विश्वास जताया कि सम्मेलन में विशेषज्ञों द्वारा प्रस्तुत शोधपत्र, सुझाव और निष्कर्ष राज्य सरकार के लिए उपयोगी साबित होंगे तथा प्रदेश में सतत पर्यटन विकास एवं प्रभावी आपदा प्रबंधन की नीतियों को दिशा देंगे।

कुलपति प्रो. अंबरीश कुमार महाजन ने कहा कि सम्मेलन में विशेषज्ञों और शोधकर्ताओं द्वारा प्रस्तुत विचार एवं शोध निष्कर्ष पर्यटन के सतत विकास, पर्यावरण संरक्षण और आपदा प्रबंधन के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान देंगे। उन्होंने कहा कि अकादमिक विमर्श से प्राप्त सुझावों को नीतियों और योजनाओं के निर्माण में उपयोगी बनाया जा सकता है।

परिसर निदेशक प्रो. एम.एस. रावत ने सम्मेलन के सफल आयोजन में सहयोग देने वाले अतिथियों, वक्ताओं, शोधकर्ताओं, प्रतिभागियों और आयोजन समिति के सदस्यों का आभार व्यक्त किया। IQAC निदेशक प्रो. गुलशन कुमार ढींगरा ने सम्मेलन के उद्देश्यों और उसकी प्रासंगिकता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि इसका प्रमुख उद्देश्य सतत पर्यटन, पर्यावरण संरक्षण और आपदा प्रबंधन से जुड़े विषयों पर शैक्षणिक विमर्श एवं शोध को प्रोत्साहित करना रहा।

ग्लेशियल झीलों और हिमालयी पर्यावरण पर जताई चिंता

नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हाइड्रोलॉजी, रुड़की के प्रो. एल.एन. ठुकराल ने जलवायु परिवर्तन के प्रमुख कारणों और हिमालयी क्षेत्रों पर उसके प्रभावों की जानकारी दी। उन्होंने बढ़ते तापमान और घटते स्नो कवर को गंभीर चुनौती बताते हुए ग्लेशियल झीलों के विस्तार, ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF) की निगरानी तथा मैपिंग टूल्स के महत्व पर विस्तार से चर्चा की।

हॉर्टिकल्चर विश्वविद्यालय भरसार के कुलसचिव प्रो. एस.पी. सती ने कहा कि जलवायु परिवर्तन का असर हिमालयी वनस्पतियों और विभिन्न फसलों के जीवन चक्र पर पड़ रहा है। उन्होंने बुरांश का उदाहरण देते हुए वनस्पतियों में हो रहे मौसमी बदलावों की ओर ध्यान आकर्षित किया। वहीं, डॉ. दीपिका यजुर्वेदी ने ग्रीन केमिस्ट्री टूरिज्म विषय पर शोधपत्र प्रस्तुत किया।

एआर-वीआर तकनीक से पर्यटन को मिलेगा नया आयाम

भूतपूर्व उच्च शिक्षा निदेशक प्रो. एन.पी. माहेश्वरी ने ‘उत्तराखंड में अनुभवात्मक पर्यटन : देवभूमि पर्यटन में बदलाव लाने में संवर्धित एवं आभासी वास्तविकता तकनीक (AR/VR) की भूमिका’ विषय पर व्याख्यान दिया। उन्होंने कहा कि आधुनिक तकनीक के माध्यम से उत्तराखंड के धार्मिक, सांस्कृतिक और प्राकृतिक पर्यटन स्थलों को नए आकर्षक स्वरूप में प्रस्तुत किया जा सकता है। एआर और वीआर तकनीक पर्यटकों को पर्यटन स्थलों का आभासी अनुभव उपलब्ध कराने के साथ पर्यटन के नए अवसर भी विकसित कर सकती है।

विरासत संरक्षण और जिम्मेदार धार्मिक पर्यटन पर मंथन

पंडित ललित मोहन शर्मा परिसर के वनस्पति विज्ञान विभागाध्यक्ष प्रो. वी.डी. पांडे ने ‘सांस्कृतिक विरासत संरचनाओं पर सायनोबैक्टीरिया का प्रभाव’ विषय पर व्याख्यान दिया। उन्होंने ऐतिहासिक स्मारकों और विरासत स्थलों पर सायनोबैक्टीरिया के प्रभाव, उनसे संरचनाओं को होने वाले नुकसान तथा संरक्षण की चुनौतियों पर प्रकाश डाला। उन्होंने सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण के लिए वैज्ञानिक उपाय अपनाने की आवश्यकता बताई।

प्रो. डी.सी. गोस्वामी ने गढ़वाल हिमालय में सतत एवं जिम्मेदार धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा देने पर जोर दिया। उन्होंने हिमालयी पर्यावरण संरक्षण, कचरा प्रबंधन, तीर्थयात्रियों की संख्या का नियमन और स्थानीय समुदायों की भागीदारी को आवश्यक बताया। उन्होंने कहा कि चारधाम की धार्मिक एवं सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित रखते हुए पर्यावरण के अनुकूल पर्यटन गतिविधियों को विकसित करना समय की जरूरत है।

प्रो. वी.पी. श्रीवास्तव ने ‘बियॉन्ड ट्रेडिशनल टूरिज्म’ विषय पर व्याख्यान देते हुए पारंपरिक पर्यटन से आगे बढ़कर नए पर्यटन अवसरों, नवाचार, सतत विकास और स्थानीय संस्कृति एवं विरासत के संरक्षण पर अपने विचार रखे।

शोध और अकादमिक विमर्श के साथ हुआ समापन

सम्मेलन के तकनीकी सत्रों में विभिन्न विषयों पर शोधपत्र प्रस्तुत किए गए और विशेषज्ञों ने जलवायु परिवर्तन तथा पर्यटन से जुड़ी चुनौतियों के समाधान के लिए आधुनिक तकनीक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता बताई। कार्यक्रम का संचालन डॉ. प्रीति खंडूरी एवं डॉ. हेमंत बिष्ट ने किया। आयोजन मंडल में डॉ. सीमा बेनीवाल, डॉ. गौरव वाष्णेय, डॉ. राकेश जोशी और डॉ. संजय महर का विशेष सहयोग रहा।

इस अवसर पर डीन विज्ञान प्रो. एस.पी. सती, डीन कला प्रो. पी.के. सिंह, डीन वाणिज्य प्रो. विजय श्रीवास्तव, चीफ प्रॉक्टर प्रो. धर्मेंद्र तिवारी, डीन छात्र कल्याण प्रो. हेमलता मिश्रा, प्रो. वी.डी. पांडे, प्रो. संगीता मिश्रा, प्रो. अधीर कुमार, प्रो. पुष्पांजलि आर्य, प्रो. दीपा शर्मा, प्रो. सुरमान, प्रो. वी.के. गुप्ता, प्रो. सी.एस. नेगी, डॉ. शालिनी रावत सहित विश्वविद्यालय के प्राध्यापक एवं शिक्षणेत्तर कर्मचारी उपस्थित रहे।

मित्रवर, इस समाचार में मंत्री डॉ. धन सिंह रावत का संबोधन, 80 शोधपत्रों की भागीदारी और सम्मेलन के तकनीकी निष्कर्षों को प्रमुखता दी गई है। शीर्षक भी अखबारी प्रस्तुति के अनुरूप रखा गया है।

 

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